मिथिलेश झा Global Warming Impact on India : पर्यावरण और मानव सभ्यता इस समय इतिहास के सबसे भीषण संकट के दौर से गुजर रही है. यूरोपीय संघ (EU) और फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च (CNRS) द्वारा वित्त पोषित क्लाइमामीटर (ClimaMeter) टीम के वैज्ञानिकों ने जून 2026 के आखिरी हफ्तों में पश्चिमी यूरोप को झुलसाने वाली अभूर्वपूर्ण हीटवेव (लू) पर एक रिपोर्ट पेश की है, जो बेहद डरावनी है. इस रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) की वजह से मौसम जानलेवा हो गया है. हिंदुस्तान भी इससे अछूता नहीं है. हिंदुस्तान में 3 मोर्चे पर तबाही के संकेत दिख रहे हैं. पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में भी हीट इंडेक्स का जानलेवा जाल फैल रहा है. हिंदुस्तान से है क्लाइमामीटर की रिपोर्ट का सीधा संबंध यूरोप को 1990 के दशक के बाद से सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप माना जा रहा है. लेकिन इस वैश्विक रिपोर्ट का सीधा संबंध हिंदुस्तान और दक्षिण एशिया के भविष्य से जुड़ा है. हिंदुस्तान में कहां-कहां चुनौतियां आने वाली हैं, उसके बारे में विस्तार से यहां जानें. 1. कोलकाता जैसे शहरों में ‘हीट इंडेक्स’ और ‘वेट बल्ब’ का जानलेवा जाल यूरोप की तरह हिंदुस्तान में भी अर्बन हीट आइलैंड्स (Urban Heat Islands) का असर बढ़ रहा है. कोलकाता, दिल्ली और मुंबई जैसे हिंदुस्तान के महानगर कंक्रीट के जंगल बन चुके हैं. जब ग्लोबल वार्मिंग के कारण बेसलाइन तापमान बढ़ता है, तो हिंदुस्तानीय शहरों में उमस और गर्मी मिलकर ‘वेट बल्ब टेम्परेचर’ को पार कर जाती हैं, जहां इंसान के शरीर का पसीना सूखना बंद हो जाता है और बैठे-बैठे ही स्ट्रोक से मौत हो जाती है. 2. कृषि और खाद्य सुरक्षा (Food Security) पर सीधा प्रहार क्लाइमामीटर की रिपोर्ट के अनुसार, हाई टेम्परेचर के साथ-साथ जमीन का सूखा (Drier Land) होना आपदा को बढ़ाता है. हिंदुस्तान एक कृषि प्रधान देश है. यदि वैश्विक तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो मानसून का चक्र पूरी तरह ध्वस्त हो जायेगा. बेमौसम बारिश और चरम हीटवेव के कारण गेहूं, धान और दलहन की फसलें खेतों में ही जल जायेंगी, जिससे देश में खाद्य सुरक्षा का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है. 3. स्वास्थ्य प्रणालियों का ध्वस्त होना और आर्थिक नुकसान जैसा कि आईएनजीवी, इटली की वैज्ञानिक डॉ अल्बेर्टी ने आगाह किया कि यह गर्मी सीधे तौर पर स्वास्थ्य प्रणालियों को क्रैश करती है. हिंदुस्तान जैसे घनी आबादी वाले देश में जहां स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा पहले से ही बहुत कमजोर है, वहां चरम हीटवेव के दौरान अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या लाखों में पहुंच सकती है. ग्रिड फेल होने और बिजली की मांग (Power Demand) बढ़ने से उत्पादन ठप हो सकता है. इसे भी पढ़ें : क्लाइमेट चेंज से रोटी पर संकट, रात की गर्मी से खतरे में खाद्य सुरक्षा रिपोर्ट के 3 सबसे खौफनाक आंकड़े क्लाइमामीटर के कॉपरनिकस ERA5 री-एनालिसिस डेटा और एनालॉग पद्धति के विश्लेषण से जो आंकड़े सामने आये हैं, वे किसी भी देश की रूह कंपा देगी. 32.7 करोड़ आबादी खतरे में : यूरोप में हीट डोम (Heat Dome) के कारण 32.7 करोड़ (327 मिलियन) लोग और 15.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक गतिविधियां सीधे तौर पर प्रभावित हुईं. 81 फीसदी आबादी ‘एक्स्ट्रीम’ कैटेगरी में : हीट डोम से प्रभावित कुल आबादी में 81 प्रतिशत लोग (करीब 26.4 करोड़) और 86 प्रतिशत संपत्ति (13.4 ट्रिलियन डॉलर) सबसे खतरनाक यानी ‘एक्स्ट्रीम’ (Extreme) श्रेणी की जानलेवा गर्मी की चपेट में रहे. मुल्कों से बड़ी त्रासदी : यदि इस हीटवेव की सबसे भीषण श्रेणी से प्रभावित 26.4 करोड़ लोगों को एक जगह मिला दिया जाये, तो यह आबादी हिंदुस्तान, चीन, अमेरिका और इंडोनेशिया के बाद दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश बन जायेगी. यह संख्या पश्चिमी यूरोप के सबसे घने शहर पेरिस की कुल आबादी से 23 गुना अधिक है. बंगाल की समाचारें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 2.5 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक गर्म हुआ वातावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्तमान में जो मौसम की परिस्थितियां बन रही हैं, वे महज 30 साल पहले की तुलना में 2.5 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक गर्म हैं. 50 साल पहले की तुलना में हमारी धरती 3.5 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक गर्म हो चुकी हैं. इसे भी पढ़ें : बंगाल में तेजी से बदल रहा मौसम, साइलेंट किलर बना ह्यूमिड हीट, घर का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेड Global Warming Impact on India : क्या कहते हैं विशेषज्ञ? CNRS-IPSL, फ्रांस के मार्को जांची कहते हैं कि वायुमंडल में ‘ब्लॉकिंग एंटी-साइक्लोन’ हमेशा से बनते रहे हैं. लेकिन इंसानी गतिविधियों (जीवाश्म ईंधन जलाने) के कारण अब बेसलाइन तापमान इतना बढ़ चुका है कि जो हवा पहले सामान्य गर्मी लाती थी, वह अब जमीन को सुखाकर रिकॉर्डतोड़ तापमान दे रही है. ये हीटवेव अब पहले से कहीं अधिक लंबी खिंच रही हैं. INGV, इटली के वैज्ञानिक टॉमासो अल्बेर्टी ने कहा- हमें इसे ‘असाधारण घटना’ कहना बंद करना होगा. यह हमारा न्यू नॉर्मल (New Normal) है, जो आ चुका है. इसके कारण स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी दबाव, बिजली कटौती (Power Outages), अस्पतालों में भारी भीड़ और अत्यधिक मौतें (Excess Mortality) हो रही हैं. ICTP, इटली की वैज्ञानिक एरिका कोपोला कहती हैं- यूरोप में रिकॉर्डतोड़ ट्रॉपिकल नाइट्स (बेहद गर्म रातें, जहां तापमान कम नहीं होता) का यह सिलसिला एक गंभीर चेतावनी है कि अब कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए इंतजार नहीं किया जा सकता. अब नहीं संभले तो इतिहास बन जाएगी सभ्यता लेसेस्टर विश्वविद्यालय के प्रो वैलेरियो लुकारिनी ने साफ-साफ कहा है कि वर्ष 2026 की गर्मी, आने वाले दशकों या सदियों की सबसे ‘भीषण’ गर्मी साबित होने वाली है. इस बयान से स्पष्ट है कि अगर वैश्विक स्तर पर और हिंदुस्तान ने अपनी ऊर्जा प्रणालियों को तुरंत रिन्यूएबल (नवीकरणीय ऊर्जा) पर शिफ्ट नहीं किया और शहरी हीट एक्शन प्लान (Urban Heat Action Plans) को सख्ती से लागू नहीं किया , तो आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती पर जीवन जीना असंभव हो जायेगा. इसे भी पढ़ें क्यों खत्म हुआ 45 फीसदी ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ का लक्ष्य! हिंदुस्तान पर क्या होगा इसका असर? फीफा वर्ल्ड कप पर जलवायु परिवर्तन की मार : 4 जुलाई के वीकेंड से पहले नॉर्थ अमेरिका में लू, 5 गुणा बढ़ी गर्मी जलवायु परिवर्तन से लड़ने पर खर्च होगा बंगाल बजट का 69 प्रतिशत पैसा,