अल्ताफ राजा से बात हो और ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ का जिक्र न आए, ऐसा कैसे हो सकता है. आखिर इसी गाने ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई. लेकिन इस गाने के पीछे की कहानी क्या है? कैसे एक गायक, जो कभी शादियों और उर्स में गाने के लिए घंटों सफर करता था, लोगों की जुबान पर चढ़ गया? बातचीत में अल्ताफ राजा ने अपने सफर के कई ऐसे किस्से सुनाए, जिनमें संघर्ष भी है, शायरी भी और कुछ दिलचस्प अनुभव भी.
आपके घर में तो पहले से संगीत का माहौल था. क्या बचपन से ही तय था कि आपको गायक बनना है?
मेरे माता-पिता दोनों कव्वाल थे. मेरी मां रानी रूपलता और पिता इब्राहिम इकबाल. घर में संगीत था, इसलिए बचपन से ही मेरा झुकाव भी उसी तरफ हो गया. मां ने हारमोनियम, ढोलक और गायकी की ट्रेनिंग के लिए प्रोत्साहित किया. संगीत मेरे लिए कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था.
लेकिन घर में संगीत का माहौल होने का मतलब यह नहीं था कि मेरे लिए रास्ता पहले से बना हुआ था. माता-पिता ने साफ कहा था कि हमारे संपर्क में लोग हैं, हम तुम्हें उनसे मिलवा सकते हैं, लेकिन काम तुम्हें खुद करना होगा. अपनी पहचान अपने दम पर बनानी पड़ेगी.
यानी माता-पिता ने संगीत सिखाया, लेकिन काम दिलाने की जिम्मेदारी खुद आप पर छोड़ दी?
हां, बिल्कुल. हमारा परिवार मिडिल क्लास था, लेकिन माता-पिता ने हमें कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी. इसलिए मेरे संघर्ष की कहानी को इस तरह नहीं बताना चाहिए कि हमने भूखे रहकर दिन गुजारे. ऐसा नहीं था. हां, काम पाने और अपनी पहचान बनाने के लिए खूब मेहनत करनी पड़ी.
मेरा पहला शो 1989 में हुआ था. जगह छोटी उदेपुर थी, गुजरात और मध्य प्रदेश की सीमा के पास. उस समय कार्यक्रमों के लिए बहुत लंबा सफर करना पड़ता था. कभी जनरल क्लास में ट्रेन से जाते थे, कभी प्रशासनी बसों से. 12 से 18 घंटे तक का सफर भी करना पड़ता था. शादियों में गाते थे, उर्स में गाते थे. जहां मौका मिलता था, वहां पहुंच जाते थे.
पहले शो के लिए कितने पैसे मिले थे?
पहले शो के लिए 3,000 रुपये मिले थे. अब सुनने में यह रकम अच्छी लग सकती है, लेकिन टीम के लोगों, आने-जाने और बाकी खर्चों के बाद मेरे पास करीब 500 रुपये ही बचे. कार्यक्रम मिल जाना अलग बात है और उससे कुछ बचा पाना अलग. धीरे-धीरे यह सब समझ में आया.
फिर रिकॉर्डिंग की दुनिया में एंट्री कैसे हुई?
1993 में मेरी मुलाकात वीनस के शकील नियाजी से हुई. उससे पहले भी मैं गा रहा था, लेकिन रिकॉर्डिंग के लिए मौका मिलना जरूरी था. मेरा पहला वॉइस टेस्ट पास नहीं हुआ. आवाज की पिच को लेकर दिक्कत थी. फिर दूसरी बार मैंने थोड़ी ऊंची पिच पर गाया और टेस्ट पास हो गया.
इसी दौर में भक्ति संगीत भी गाया. 1993 में ‘सजदा रब को कर ले’ नाम का एक ट्रैक किया. एक पहले से मौजूद ट्रैक के शब्द बदलकर इसे तैयार किया गया था. करीब तीन-चार साल तक मैं इस तरह के गाने गाता रहा.
और फिर आया ‘तुम तो ठहरे परदेसी’. इस गाने ने आपकी जिंदगी बदल दी. इसकी शुरुआत कैसे हुई?
एक टीवी चैनल पर मैंने यह गाना लाइव गाया था. उसकी रिकॉर्डिंग ज्यादा लोगों तक पहुंची और धीरे-धीरे गाने की पहचान बढ़ने लगी. कई बार ऐसा होता है कि आप गाना गा रहे होते हैं, लेकिन आपको खुद अंदाजा नहीं होता कि वह कितने लोगों तक पहुंचने वाला है.
जब सोलो एल्बम करने की बात आई, तो क्या शुरू से ही इसका नाम ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ था?
नहीं, पहले एल्बम का नाम ‘पंगा ले लिया’ रखा गया था. 1996 में सोलो एल्बम करने का फैसला हुआ था. उस समय गानों का एक कलेक्शन था, जिसमें ‘आवारा हवा का झोंका’, ‘मेरी याद आई’ और ‘दोनों ही मोहब्बत के जज्बात में जलते हैं’ जैसे गाने थे.
बाद में डिस्ट्रीब्यूटर ने सुझाव दिया कि एल्बम का नाम ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ रखा जाए. लोगों के बीच यह गाना पहचाना जाने लगा था. उन्हें नाम सुनकर ही पता चल जाता कि एल्बम में कौन-सा गाना है. इसलिए नाम बदल दिया गया.
उस समय तो कैसेट का जमाना था. क्या लोग आपके गानों की कैसेट खरीदने के लिए भी उत्साहित रहते थे?
हां, कव्वाली में गाने के बाद हमारी टीम के लोग कैसेट बेचते थे. एक कैसेट की कीमत करीब 17-18 रुपये होती थी. कई बार लोग 50 या 60 रुपये भी दे देते थे. वे गाना अपने पास रखना चाहते थे. आज मोबाइल पर एक क्लिक में गाना सुन लेते हैं, लेकिन उस समय कैसेट खरीदने और उसे बार-बार सुनने का अपना अलग एक्सपीरियंस था.
आपकी गायकी में गजल का रंग भी दिखाई देता है. क्या आप हमेशा से गजल गाना चाहते थे?
मुझे गजलें पसंद थीं. मैं गजल गाना चाहता था, लेकिन माता-पिता समझाते थे कि इस लिमिटेड एक्सपोजर है. जगजीत सिंह, गुलाम अली, पंकज उधास और अनूप जलोटा जैसे बड़े नाम पहले से मौजूद थे. ऐसे में सिर्फ गजल के सहारे आगे बढ़ना आसान नहीं होता.
उनकी बात अपनी जगह सही थी, लेकिन गजल का असर मेरी गायकी में हमेशा रहा. ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ की लय और मीटर में भी गजल जैसा एहसास है.
इस गाने में शायरी भी इसकी लोकप्रियता की बड़ी वजह रही. इसके शेर कैसे चुने गए?
‘तुम तो ठहरे परदेसी’ निजाम साहब ने लिखा था. गाने में शेरों का चुनाव भी जरूरी था. कई शेर थे, उनमें से देखना होता था कि कौन-सा शेर गाने के भाव के साथ बैठेगा. मेरे पिता को शायरी की अच्छी समझ थी. उनकी समझ और सलाह से भी मदद मिलती थी.
मैं खुद भी शायरी पढ़ता था. स्थानीय शायरों की किताबें तलाशता था और लाइब्रेरी में उर्दू के डाइजेस्ट पढ़ता था. मुझे सिर्फ आसान शब्दों वाली शायरी तक सीमित नहीं रहना था. शेर का भाव समझना और उसे गाते समय आवाज में उतारना जरूरी लगता था.
इस गाने के कुछ शेर आज भी लोगों को याद हैं. मसलन, अगस्त और दिसंबर वाला शेर
हां, उसमें आता है, ‘माहे अगस्त में बरसात हो रही थी, आंसुओं की बारिश दिन-रात हो रही थी.’
फिर है, ‘जब आ गया दिसंबर, जज्बात मर चुके थे, मौसम था सर्द, अरमान बिखर चुके थे.’
इन पंक्तियों में समय के साथ एहसास बदलते हैं. पहले आंसुओं की बारिश है, फिर दिसंबर की ठंड और बिखर चुके अरमान. शायद इसी वजह से लोग इन पंक्तियों से जुड़ पाते हैं. हर किसी की जिंदगी में कोई न कोई ऐसा अनुभव होता है, जिसे वह इन शब्दों में महसूस कर सकता है.
जौहर कानपुरी साहब का एक शेर भी याद आता है. उसकी पूरी पंक्तियां अभी स्पष्ट नहीं हैं. नरेश कुमार शाद की शायरी भी मैंने गाई है. उनकी पंक्तियां हैं, ‘अश्कों में उसने रंग समोता रहा हूं मैं, दामन किसी का थाम के रोता रहा हूं मैं…’
एक और पंक्ति है, ‘निखरा है जैसे अब कहीं चेहरा शऊर का…’ ऐसी शायरी गाने के लिए शब्दों को समझना पड़ता है. सिर्फ धुन पर गा देने से बात नहीं बनती.
इतने साल बाद भी जब आप मंच पर यह गाना गाते हैं, तो क्या इसमें कुछ नया जोड़ते हैं?
हां, लाइव शो में मैं इसके नए-नए अंतरे जोड़ता रहता हूं. लोग गाने को सुनना चाहते हैं. मंच पर उसे कुछ अलग तरीके से पेश करने का मौका मिलता है. गाना पुराना जरूर है, लेकिन हर बार गाने का अनुभव नया होता है.
मेरे आधिकारिक यूट्यूब चैनल ‘Altaf Raja Official (786)’ पर ‘तुम तो ठहरे परदेसी पार्ट 2’ भी है. इसमें जनवरी से अप्रैल तक की कहानी आगे बढ़ती है. उसमें ‘बेवफा थी पहले, तुम अपनी बेवफा…’ जैसा हिस्सा है.
नब्बे के दशक में आपकी लोकप्रियता को लेकर कई तरह की बातें होती हैं. कभी इसकी तुलना अंतरराष्ट्रीय सितारों की लोकप्रियता से भी की जाती है. आपको अपने प्रशंसकों से जुड़ा कोई ऐसा किस्सा याद है, जिसने आपको हैरान किया हो?
एसएल स्टूडियो में एक जूनियर कलाकार ने मुझसे कहा था कि वह मेरा गाना सुने बिना सो नहीं पाता. उसने मेरे गाने को अपने लिए टॉनिक जैसा बताया. ऐसी बातें सुनकर अच्छा लगता है. कलाकार के लिए यह बड़ी बात है कि उसका गाना किसी की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए.
बर्मिंघम में एक व्यक्ति ने बताया कि उसकी दादी, मां, पत्नी और बेटी, चारों मेरी प्रशंसक हैं. एक ही परिवार की अलग-अलग पीढ़ियों का आपके गाने से जुड़ना अच्छी बात है. लोकप्रियता को सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता. लोगों की जिंदगी में आपके गाने की कितनी जगह है, यह भी मायने रखता है.
लेकिन लोग आपको सबसे ज्यादा ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ के लिए ही जानते हैं. क्या कभी लगा कि आपकी दूसरी तरह की गायकी पीछे छूट गई?
लोग इस गाने के लिए याद करते हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन मैंने मुश्किल शब्दों वाली शायरी भी गाई है. नरेश कुमार शाद जैसे शायरों की पंक्तियां गाने में शब्दों की समझ और भाव की जरूरत होती है. मैं चाहता था कि लोग मेरे गानों के दूसरे रंगों से भी परिचित हों.
सफलता के साथ आलोचना भी आती है. क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ?
मैं कहता हूं, ‘Critics is the shadow of success’. जब आप सफल होते हैं, तो आपकी आलोचना भी होती है. लोग आपके काम पर बात करते हैं, कमियां निकालते हैं और कभी-कभी जलन भी सामने आती है. जब कोई कलाकार लोगों की नजर में ही नहीं होता, तो उसकी आलोचना करने वाले भी कम होते हैं.
वी चैनल ने मुझे हिंदी पॉप और कव्वाली की श्रेणी में रखा था. संगीत की दुनिया में कलाकारों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है. इसमें बाजार और संगीत की बिक्री का भी असर होता है. मेरी गायकी में कव्वाली, गजल और पॉप संगीत के रंग रहे हैं.
फिल्मों में गाने का मौका कैसे मिला? क्या बॉलीवुड में जाने की इच्छा पहले से थी?
नहीं, मैंने कभी यह सोचकर गायकी शुरू नहीं की थी कि आगे चलकर बॉलीवुड में गाना है. फिल्मों में गाने का मौका मेरे लिए भगवान की देन और माता-पिता की दुआओं की तरह आया. फिल्म ‘शपथ’ का ऑफर मिला. आनंद-मिलिंद के साथ गाना रिकॉर्ड किया गया और फिर उसे फिल्माया भी गया. यह मेरे सफर का एक अलग अनुभव था.
आज आपकी गायकी को नई पीढ़ी भी सोशल मीडिया पर इस्तेमाल कर रही है. जब युवा आपके गानों पर रील बनाते हैं, तो कैसा लगता है?
अच्छा लगता है कि नई पीढ़ी भी मेरे गाने सुन रही है. लोग गानों पर रील बनाते हैं और कई बार माइकल जैक्सन जैसे डांस स्टेप्स भी करते हैं. आयशा सिद्दीकी और रजा मुराद से जुड़े वीडियो भी इस सिलसिले में चर्चा में आए हैं.
आज सोशल मीडिया की वजह से पुराने गाने नए लोगों तक पहुंच रहे हैं. कई ऐसे लोग भी गाना सुनने लगते हैं, जिन्होंने इसके रिलीज होने के समय इसे नहीं सुना था. मेरे लिए यही खुशी की बात है कि गाना अपने दौर तक सीमित न रहे. इतने साल बाद भी लोग उसे सुनें, उस पर वीडियो बनाएं और अपने अंदाज में उससे जुड़ें. इसका मतलब है कि संगीत का सफर अभी जारी है.
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