20 जुलाई का दिन था. नीट पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी संसद की ओर मार्च करने वाली थी. उसके पहले से उनका प्रदर्शन जंतर-मंतर पर चल रहा था. नीट पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का गुस्सा दिख रहा था. मार्च के दौरान पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए सख्ती की. लाठियां बरसाईं और पैलेट गन भी चलाए. छात्रों के खिलाफ इस सख्ती से ना सिर्फ जनता नाराज हुई, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रशासन को खरी-कोटी सुनाई. वहीं सीजेपी जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अक्टूबर में दिल्ली में प्रदर्शन करना चाही, तो उनका पूरा कैंपेन ही फेल हो गया.
आखिर ऐसा क्यों हुआ? यह सवाल लोगों के मन में तो है ही शायद सीजेपी के समर्थकों के मन में भी है. इस बारे में सोशल मीडिया में काफी चर्चा है. सोशल मीडिया में चर्चा के दौरान यह दावा किया जा रहा है कि उनकी लीगल हेड रत्ना सिंह ने उन्हें ऐसे-ऐसे सुझाव दिए, जिसकी वजह से उनका पूरा प्रोटेस्ट, उसका आइडिया ही फेल हो गया. आइए जानते हैं कि सोशल मीडिया में किस तरह की चर्चा हो रही है और उसके पीछे की सच्चाई क्या है-
बीजेपी की बी-टीम हैं रत्ना सिंह
पहले वो एक्स पोस्ट देखिए जिसमें यह दावा किया गया है कि रत्ना सिंह बीजेपी की बी-टीम हैं-
सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर बिना अनुमति के प्रदर्शन के लिए राजी किया
सोशल मीडिया में यह भी दावा किया गया है कि रत्ना ने ही सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर बिना अनुमति के प्रदर्शन के लिए राजी किया था. प्रशासन ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से 11 अक्टूबर को हटा दिया था. बावजूद इसके 13 अक्टूबर को सौरव दास और आशुतोष रांका ने प्रदर्शन किया, जिसके बाद उन्हें पहले डिटेन किया गया और फिर गिरफ्तारी हुई. वे 21 अक्टूबर को जेल से बाहर आए यानी गिरफ्तारी के आठवें दिन.
अभिजीत दीपके के बारे में भी यह दावा किया गया है कि रत्ना ने उन्हें प्रदर्शन के लिए राजी किया और जेल जाने से बचने के लिए दीपके से एक पीस बाॅन्ड भरवा दिया. पोस्ट में यह दावा किया जा रहा है कि रत्ना हिंदुस्तान से सीजेपी को हमेशा के लिए खत्म करने का काम कर रही हैं. जो घटनाएं हुईं उसके बारे में हमने आपको बताया. रत्ना का पक्ष हमारे पास नहीं है, क्योंकि उन्होंने हमसे संपर्क करना जरूरी नहीं समझा.
सीजेपी नेताओं के सुर बदले
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जुलाई में सीजेपी ने जो प्रोटेस्ट किया था और जितना समर्थन जुटाया था, वह सबकुछ वे 10 अक्टूबर को नहीं कर सके. इस बार उनका आंदोलन कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया. प्रशासन की तैयारी भी बहुत थी. अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास के सुर भी जेल से छूटने के बाद बदले हुए हैं. दीपके ने वीडियो पोस्ट कर त्योहार मनाने की बात आम जनता से कही थी. सौरव दास और रांका भी सिर्फ यही कह सकें कि प्रोटेस्ट जारी रहेगा. कोर्ट की सख्ती भी उनपर साफ दिखाई दी है. कोर्ट ने कहा है कि आप पीस बाॅन्ड भरते हैं और अगले ही दिन उसे तोड़ देते हैं. यानी इस बार कठिन है डगर आंदोलन की.
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