BJP MLC Candidate: हिंदुस्तानीय जनता पार्टी ने बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 के लिए अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है. पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने चार उम्मीदवारों को मंजूरी दी है. जारी सूची के अनुसार पवन सिंह, डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को उम्मीदवार बनाया गया है. पार्टी ने इन नामों पर अंतिम सहमति दे दी है.

जदयू ने भी उम्मीदवारों की घोषणा की
जनता दल यूनाइटेड ने भी बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए अपने चार उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया है. पार्टी ने निशांत कुमार, हिंदुस्तानी मंडल, ललन प्रसाद और शिवरानी देवी को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया है.
जेडीयू की ओर से पटना सीट के लिए निशांत कुमार को उम्मीदवार बनाया गया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सीट से ललन प्रसाद को पार्टी ने अपना प्रत्याशी घोषित किया है.
मधुबनी से हिंदुस्तानी मेहता को और पश्चिमी चंपारण से शिवरानी देवी प्रजापति को जदयू ने बिहार विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया है.
जदयू में तीन अति पिछड़े, भाजपा में दो सवर्ण और दो अति पिछड़े
एनडीए के आठ घोषित उम्मीदवारों में पांच अतिपिछड़ों को जगह दी गयी है. एक स्वास्थ्य मंत्री नियशांत पिछड़े वर्ग से उम्मीदवार बनाये गये हैं. जबकि भाजपा के चार उम्मीदवारों में संजय मयूख और पवन सिंह सवर्ण उम्मीदवार बनाये गये हैं. जबकि शीला पंडित और अनिल कुमार ठाकुर अति पिछड़े समाज का प्रतिनिधित्व करेंगे.
जदयू के चारों नये चेहरे, भाजपा में संजय मयूख तीसरी बार बनेंगे एमएलसी
जदयू ने जिन चार उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है. उनमें सभी नये चेहरे हैं. चारों उम्मीदवार पहली बार किसी सदन के सदस्य होंगे. भाजपा के चार उम्मीदवारों में संजय मयूख तीसरी बार उम्मीदवार बनाये गये हैं. पार्टी ने उनके नाम पर भरोसा जताते हुए एक बार फिर उपरी सदन भेजने का फैसला लिया है. तीन अन्य उम्मीदवार पवन सिंह, अनिल ठाकुर और शीला पंडित पहली बार उम्मीदवार बनायी गयी हैं.
कैसे तय होती है जीत
243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 9 विधान परिषद सीटों के लिए चुनाव होना है. ऐसे में जीत का आंकड़ा कुल मतदान करने वाले विधायकों की संख्या के आधार पर तय किया जाता है. अगर सभी 243 विधायक वोट डालते हैं, तो चुनावी नियमों के अनुसार जीत का कोटा निकाला जाता है. इसके लिए कुल वोट मूल्य 24300 माना जाता है, क्योंकि हर विधायक के वोट की कीमत 100 होती है.
इसके बाद 24300 को 10 से भाग दिया जाता है, क्योंकि 9 सीटों के साथ एक संख्या और जोड़ी जाती है. इससे आंकड़ा 2430 आता है. इसमें 1 जोड़ने पर जीत का कोटा 2431 हो जाता है. यानी किसी भी उम्मीदवार को जीत दर्ज करने के लिए कम से कम 2431 वोट मूल्य हासिल करना होगा. आसान भाषा में कहें तो लगभग 25 विधायकों की पहली वरीयता का समर्थन किसी उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए पर्याप्त माना जाता है.
एनडीए और महागठबंधन की स्थिति
वर्तमान समय में विधानसभा में एनडीए के पास जदयू, भाजपा, लोजपा (रामविलास), हम और रालोमो को मिलाकर 202 विधायक हैं. इस संख्या के आधार पर एनडीए आसानी से 8 सीटें जीत सकता है. दूसरी तरफ महागठबंधन के पास राजद, कांग्रेस, माले, सीपीएम और अन्य सहयोगी दलों को मिलाकर 35 से ज्यादा विधायक हैं. इसके अलावा एआईएमआईएम और बसपा के विधायक भी विपक्षी खेमे में हैं. कुल मिलाकर विपक्ष के पास लगभग 41 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त हैं.
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दूसरी वरीयता के वोट क्यों अहम
यदि पहली वरीयता के वोटों से सभी सीटों का फैसला नहीं हो पाता, तो दूसरी वरीयता के मतों की गिनती शुरू होती है. इसी प्रक्रिया से पहले भी राज्यसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शिवेश राम को जीत मिली थी. उस चुनाव में कई उम्मीदवार पहले दौर में ही जीत गए थे. उनके अतिरिक्त वोटों की वैल्यू निकालकर दूसरी वरीयता के आधार पर दूसरे उम्मीदवार को ट्रांसफर किया गया. इसी वजह से शिवेश राम जीत का आंकड़ा पार कर सके थे.
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