जमुई में छात्रा से छेड़छाड़ का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि समस्तीपुर से एक युवती के साथ अभद्रता का एक और वीडियो सामने है. बिहार का जमुई हो, समस्तीपुर हो, मधेपुरा हो या देश का कोई दूसरा कोना…ऐसी घटनाएं अब नई नहीं हैं, और तो और इसको लेकर दी जाने वाली दलीलें भी वही रटी-रटाई हैं, मोरल पुलिसिंग!
यानी नए दौर का सोशल मीडिया हो या फिर हमारी कथित परंपरा… एक चीज आज भी कॉमन है, बिन मांगी दी जाने वाली सलाह या रोक-टोक करने का हक. हैरानी की बात यह है कि इस कथित अधिकार के लिए न कोई अनुमति चाहिए, न योग्यता और न ही जवाबदेही. जमुई मामले में तो अपराधी को लेकर जो तर्क दिए जा रहे हैं वो कुछ ऐसा ही है.यानी महज 48 घंटे में हुई समस्तीपुर और जमुई की ये दो घटनाएं ही काफी हैं, यह बताने के लिए यह विषय इतना प्रासंगिक क्यों है?
मगर सवाल सिर्फ विषय के प्रासंगिकता का नहीं है. हमें यह भी समझना होगा कि कैसे समाज लंबे समय से मोरल पुलिसिंग के नाम पर स्त्रीओं के साथ होने वाले अपराध, खासकर यौन हिंसा को बढ़ावा दे रहा? और इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है?
मोरल पुलिसिंग के पीछे क्या होता है असली मकसद
इस सवाल का जवाब जानने से पहले ये समझना जरूरी है कि मोरल पुलिसिंग है क्या ? देखिए इन्फोग्राफिक
हिंदुस्तान में मोरल पुलिसिंग का इतिहास सिर्फ आज के विवादों तक सीमित नहीं है. इसकी जड़ें पुराने सामाजिक नियमों से लेकर औपनिवेशिक दौर के कानूनों तक जाती हैं.
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क्या है इसका समाधान
- मोरल पुलिसिंग के जिक्र के साथ अनुशासन और आजादी के बीच संतुलन का सवाल भी सामने आता है. इसे समझने के लिए हमने बिहार राज्य बाल श्रमिक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कांत मिश्रा से बात की.
- राजीव कांत मिश्र के अनुसार, आज के युवाओं में भटकाव इन समस्याओं का अहम कारक है और इसके पीछे कोई एक वजह नहीं है. परिवार, समाज, आर्थिक स्थिति, मानसिक दबाव और बदलता डिजिटल माहौल इसके कई कारण हैं.
- राजीव कहते हैं कि फिल्मों में दिखाई जाने वाली अवास्तविक हिंसा भी युवाओं को सामाजिक संस्कारों से दूर कर रही है. वहीं, शिक्षा व्यवस्था उन्हें डिग्रियां तो दे रही है, लेकिन संस्कार और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए जरूरी व्यावहारिक कौशल नहीं सिखा रही.
- मिश्र के मुताबिक, अभिभावक कई बार इस डर से उचित अनुशासन नहीं बना पाते कि शिशु कोई आत्मघाती या गलत कदम न उठा लें. डिजिटल दौर में परिवार के भीतर बातचीत भी कम हुई है और पूरा परिवार अपने-अपने मोबाइल फोन में सिमट गया है. बच्चों पर बाहरी माहौल का असर भी पड़ रहा है, जिस पर कई बार अभिभावकों का ध्यान नहीं जा पाता.
- समाधान के तौर पर मिश्र स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा यानी वोकेशनल ट्रेनिंग शुरू करने की जरूरत बताते हैं. उनका कहना है कि 12वीं से पहले ही वोकेशनल कोर्स शुरू किए जाएं, ताकि छात्र समय रहते व्यावहारिक हुनर सीखें और सकारात्मक गतिविधियों में व्यस्त रहें.
- मिश्र के मुताबिक, बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल पर एक निश्चित उम्र तक अभिभावकों और स्कूलों का सख्त नियंत्रण होना चाहिए. युवाओं को सकारात्मक कामों में व्यस्त रखने की जरूरत है. उनका मानना है कि इससे उपद्रव करने या रील्स में समय गंवाने का अवसर कम होगा.
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