Explained: NEET से ज्ञानेश कुमार तक, अभिजीत दीपके का आंदोलन कितना बदला; मोदी सरकार पर कितना दबाव?
एक आंदोलन ने शिक्षा मंत्री की कुर्सी हिला दी, दूसरा सीधे चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है; लेकिन क्या इस बार भी केंद्र प्रशासन उसी तरह दबाव में आएगी? कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP का उदय NEET-UG पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन से हुआ था. दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे प्रदर्शन के बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. अब वही संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है. 2 अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में CJP ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया. दिल्ली के जंतर-मंतर पर इसी मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिक समूहों के प्रदर्शन हुए. CJP ने अब 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर फिर प्रदर्शन की घोषणा की है. दीपके का कहना है कि आंदोलन तीन दिन का नहीं, तीन महीने तक चल सकता है. NEET से ज्ञानेश कुमार तक आखिर कितना बदला आंदोलन? पहली नजर में दोनों आंदोलनों में काफी समानता दिखाई देती है. दोनों में युवा बड़ी संख्या में जुड़े, सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ और CJP ने एक स्पष्ट मांग को आंदोलन का केंद्र बनाया. लेकिन दोनों आंदोलनों का मूल चरित्र अलग है. NEET आंदोलन का सीधा संबंध छात्रों के भविष्य से था. परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों को प्रभावित किया. यही वजह थी कि मामला जल्दी ही देशभर में फैल गया. प्रशासन ने मामले की जांच CBI को सौंपी और कानून भी बनाया. बाद में CJP का आंदोलन तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ही समाप्त हुआ. 25 जुलाई 2026 को प्रधान ने इस्तीफा दे दिया. NEET आंदोलन का स्पष्ट समीकरण था, छात्र बनाम परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा मंत्रालय. अब समीकरण बदल गया है इस बार CJP का निशाना चुनाव आयोग है और मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की है. मुद्दा मतदाता सूची, Special Intensive Revision यानी SIR और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़ा है. यह केवल किसी परीक्षा में गड़बड़ी का मामला नहीं है. यह उस संस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है, जो चुनाव कराने के लिए संवैधानिक रूप से जिम्मेदार है. इस बार आंदोलन का दायरा बड़ा, लेकिन रास्ता ज्यादा कठिन यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी चुनौती दोनों है. CJP का आरोप है कि SIR और मतदाता सूची में बदलाव से बड़ी संख्या में मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. विपक्षी दल भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची को लेकर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन चुनाव आयोग इन आरोपों को उसी रूप में स्वीकार नहीं करता. आयोग ने 23 सितंबर को कहा कि SIR समेत उसके सभी फैसले आयोग में सबकी सहमति से लिया गया. आयोग ने यह भी कहा कि लिखित टिप्पणियां और आंतरिक आपत्तियां बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के सामान्य checks and balances का हिस्सा हैं. 26 सितंबर के अपने एक अन्य निर्णय में आयोग ने यह भी कहा कि जिन मतदाताओं के नाम छूट गए हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के जरिए नाम जुड़वा सकते हैं. आयोग ने दावों और आपत्तियों की समयसीमा भी कुछ जगहों पर बढ़ाई. इसलिए मौजूदा विवाद में दो दावे आमने-सामने हैं. एक तरफ CJP और विपक्षी समूह चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं. दूसरी तरफ चुनाव आयोग कह रहा है कि SIR कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ है और आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. यही वह बिंदु है जहां मौजूदा आंदोलन को NEET आंदोलन से अलग करके देखना जरूरी है. ये भी पढ़ें: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विजिलेंस जांच के आदेश ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना आसान नहीं ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग के प्रमुख हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. इसलिए CJP की सीधी मांग केंद्र प्रशासन के किसी मंत्री को हटाने की मांग जैसी नहीं है. ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना आसान नहीं है. संविधान ने CEC को बहुत मजबूत सुरक्षा दी है, ताकि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बनी रहे. संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है. सीईसी को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाया जा सकता है. दोनों सदनों में प्रस्ताव को साधारण बहुमत से नहीं, बल्कि विशेष बहुमत से पारित होना होता है. इसके बाद ही हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है. संसद की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति CEC को पद से हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं. अगर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते हैं, विपक्ष इसे संसद और सड़क दोनों पर मुद्दा बनाता है और युवा संगठन इसे राष्ट्रीय आंदोलन का रूप देने में सफल होते हैं, तो बहस स्वाभाविक रूप से केंद्र प्रशासन तक पहुंचती है. 2 अक्टूबर के प्रदर्शन में यह बात साफ दिखी. मुंबई में CJP का प्रदर्शन था, जबकि दिल्ली में AAP, वामपंथी छात्र संगठनों और नागरिक समूहों ने भी प्रदर्शन किया. कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया. यानी इस बार CJP अकेले मुद्दा नहीं उठा रहा. यही वह बदलाव है जिसे मोदी प्रशासन के लिए नेतृत्वक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि केंद्र प्रशासन उसी स्तर के दबाव में आ गई है, जैसा NEET आंदोलन के अंतिम चरण में दिखा था. ये भी पढ़ें: Watch Video: थाने के बाहर भड़के CJP प्रवक्ता सौरव दास, बोले- पुलिस बात करे, वरना अंदर घुसेंगे सवाल- क्या मुंबई की भीड़ देशव्यापी आंदोलन बनेगी? 2 अक्टूबर के जेल भरो आंदोलन में बड़ी संख्या में युवा और समर्थक जुटे थे. सोशल मीडिया पर अभियान चला. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे और पोस्टर चर्चा में रहे. लेकिन किसी आंदोलन का भविष्य केवल एक दिन की भीड़ तय नहीं करती. तीन सवाल, जो महत्वपूर्ण हैं पहला – क्या CJP महाराष्ट्र के बाहर लगातार भीड़ जुटा पाएगा? दूसरा – क्या यह मुद्दा केवल नेतृत्वक कार्यकर्ताओं तक रहेगा या आम मतदाताओं तक पहुंचेगा? तीसरा – क्या विपक्षी दल लंबे समय तक CJP के साथ खड़े रहेंगे? अगर ये तीनों चीजें होती हैं, तो आंदोलन का आकार

