सर्कस का टेंट लगा है. सामने हजारों दर्शकों के बैठने की जगह है. स्टेज पर रोशनी है. म्यूजिक बज रहा है. कलाकार अपने करतब के लिए तैयार हैं. लेकिन सामने की तस्वीर किसी को भी बेचैन कर सकती है. हजारों सीटों में सिर्फ 4-5 दर्शक बैठे हैं. इतनी बड़ी जगह और उसके बीच कुछ गिने-चुने लोग. फिर भी कलाकार अपनी पूरी ताकत से परफॉर्म कर रहे हैं. चेहरे पर मुस्कान है. शरीर में वही फुर्ती है. जैसे सामने पूरा स्टेडियम भरा हो. क्योंकि सर्कस में एक बात शायद कभी नहीं बदलती. शो मस्ट गो ऑन. लेकिन सवाल यह है कि आखिर वह सर्कस कहां चला गया, जिसके तंबू के बाहर टिकट के लिए भीड़ लगती थी? जिस सर्कस में कलाकारों का एक करतब देखने के लिए शिशु परिवार के साथ पहुंचते थे? और क्या आज सर्कस सिर्फ फिल्मों की कहानी बनकर रह गया है? यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यश की फिल्म ‘Toxic’ में सर्कस कहानी का एक अहम हिस्सा है. फिल्म में कियारा आडवाणी सर्कस आर्टिस्ट के किरदार में नजर आती हैं. बड़े पर्दे पर यह दुनिया रंगीन, रहस्यमयी और रोमांचक नजर आएगी. लेकिन उसी सर्कस की असली दुनिया में तस्वीर काफी अलग है. इसी फर्क को समझने के लिए हमने रैंबो सर्कस के मालिक सुरजीत और करीब 40 साल से सर्कस में जोकर के तौर पर काम कर रहे बिरजू से बात की. एक की नजर से सर्कस एक बड़ा सेटअप है, जिसे चलाने के लिए लगातार मेहनत और संसाधन चाहिए. दूसरे की जिंदगी ने सिखाया है कि सर्कस की असली कीमत सिर्फ टिकट से नहीं चुकाई जाती. कलाकार अपना पूरा जीवन इसमें लगा देते हैं. एक दौर ऐसा भी था, टिकट के लिए लगती थी लंबी कतार एक तरफ फिल्म का सेट, दूसरी तरफ खाली सीटें फिल्म की दुनिया में सर्कस को कैमरा अपनी नजर से दिखाता है. उसे खूबसूरत बनाया जाता है. रोशनी, कैमरा और कलाकार मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जो दर्शकों को अपनी तरफ खींचे. असल सर्कस में सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि दर्शक आएंगे कितने? बिरजू करीब 40 साल से सर्कस से जुड़े हैं. उन्होंने इस दुनिया को अपने सामने बदलते देखा है. देश के अलग-अलग हिस्सों में सर्कस के साथ सफर किया. कलाकारों के साथ काम किया. मंच पर जोकर बनकर लोगों को हंसाया. लेकिन आज कई बार सामने सिर्फ दो-तीन या चार-पांच दर्शक होते हैं. फिर भी कलाकार रुकते नहीं. करतब दिखाते सर्कस के कलाकार चोट लगी तो कलाकार का क्या? बिरजू ने सर्कस की एक ऐसी तस्वीर भी बताई, जिसे चमकते तंबू के बाहर शायद ही कोई देखता है. उनके मुताबिक, कई कलाकारों को काम के दौरान गंभीर चोटें लगी हैं. किसी की टांग टूट गई. किसी की कमर में चोट आई. कई लोग ऐसी स्थिति में पहुंच गए कि बाद में ठीक से चल तक नहीं पाए. सवाल सिर्फ चोट का नहीं है. सवाल यह है कि जब कलाकार काम करने लायक नहीं रहता, तब उसके परिवार का क्या होता है? यही वह जगह है जहां बिरजू की बात सिर्फ सर्कस की नहीं रह जाती. यह हर उस कलाकार की चिंता बन जाती है, जिसका शरीर ही उसकी रोजी-रोटी है. विदेश में एक हिंदुस्तानीय क्लाउन की तस्वीर देखकर बदल गया नजरिया बिरजू ने एक ऐसा किस्सा भी बताया, जो इस कहानी का सबसे भावुक हिस्सा बन जाता है. एक बार विदेश में किसी व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई. बातचीत के दौरान पता चला कि उसके घर में एक हिंदुस्तानीय क्लाउन की तस्वीर लगी है. जब बिरजू ने तस्वीर देखी तो वह हैरान रह गए. एक हिंदुस्तानीय सर्कस कलाकार की तस्वीर विदेश में इतनी अहमियत के साथ रखी गई थी. जिस कलाकार को अपने देश में शायद कोई पहचानता तक नहीं. उसकी कला किसी दूसरे देश में किसी के लिए इतनी खास थी कि उसकी तस्वीर घर के बेडरूम में लगी थी. बिरजू के लिए यह गर्व की बात भी थी और सवाल भी. अगर दूसरे देशों में सर्कस कलाकारों को उनके काम के लिए सम्मान मिल सकता है. अगर उनकी कला को पहचान मिल सकती है. तो फिर अपने देश में ये कलाकार अब भी सम्मान और सुविधाओं के लिए क्यों जूझ रहे हैं? 40 साल सर्कस में गुजारे, लेकिन बच्चों से कहा- दूसरा रास्ता चुनो बिरजू की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास शायद यही है. जिस सर्कस ने उन्हें 40 साल तक रोजी दी. उसी सर्कस में वह अपने बच्चों का भविष्य नहीं देख पाए. उन्होंने अपने बच्चों से पूछा कि वे क्या करना चाहते हैं. क्या वे भी सर्कस में आना चाहते हैं या पढ़-लिखकर कुछ और बनना चाहते हैं. बच्चों ने दूसरा रास्ता चुना. आज उनका एक बेटा फिल्म एडिटर है और दूसरा डॉक्टर. बिरजू खुद कहते हैं कि उन्होंने सर्कस से जो कमाया, उसी से बच्चों को पढ़ाया. वह खुद ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं. लेकिन वह चाहते थे कि उनके बच्चों के पास ऐसे विकल्प हों, जो उनके पास नहीं थे. यह बात शायद सर्कस की हालत पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है. अगर 40 साल से सर्कस में काम करने वाला कलाकार भी अपने बच्चों को सर्कस में नहीं भेजना चाहता, तो आने वाले वक्त में इस कला को आगे कौन ले जाएगा? सर्कस सिर्फ खाली सीटों की कहानी नहीं है आज सर्कस को टीवी, फिल्मों और डिजिटल कंटेंट से भी चुनौती मिल रही है. दर्शकों के पास मनोरंजन के इतने विकल्प हैं कि उन्हें एक तंबू के नीचे जाकर शो देखने के लिए मनाना पहले जैसा आसान नहीं रहा. बिरजू कहते हैं कि आज टीवी पर बहुत कुछ देखने को मिल जाता है. जिम्नास्टिक और ऐसे कई करतब भी लोगों तक दूसरे माध्यमों से पहुंच रहे हैं. जिस कला को कभी देखने के लिए लोग सर्कस पहुंचते थे, उसका एक हिस्सा अब स्क्रीन पर घर बैठे मिल जाता है. लेकिन सर्कस में अभी भी कुछ ऐसा है, जिसे स्क्रीन पूरी तरह नहीं दे सकती. वह है सामने बैठकर कलाकार की मेहनत देखना. उसकी सांसों के साथ करतब का जोखिम महसूस करना. और उसके बाद तालियां बजाना. दिक्कत बस इतनी है कि अब उन तालियों के लिए सीटें भरनी बाकी हैं. ‘Toxic’ में जब कियारा आडवाणी सर्कस